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'हमारी विभूतियाँ' में आप अध्यात्म के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त महान संत एवं समाज सुधारक  श्रीमंत शंकरदेव जी से मिलेंगे :

'हमारी विभूतियाँ' में आप अध्यात्म के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त महान संत एवं समाज सुधारक  श्रीमंत शंकरदेव जी से मिलेंगे :

श्रीमंत शंकरदेव का जन्म सन् 1449 ई. में नगाँव जिले के आलिपुखुरी गाँव में एक असमिया कायस्थ परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम था कुसुम्बर शिरोमणि भूइयाँ और माता का नाम सत्यसंध्या था । भगवान शिव के वरदान से पुत्र प्राप्त होने के कारण उनका नाम माता-पिता ने शंकर रखा । जन्म के कुछ समय पश्चात् माता-पिता का देहांत हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया । उनका जन्म नगाँव जिले के आलिपुखुरी नामक स्थान में हुआ था । इनके माता – पिता का निधन बचपन में ही हो गया था । इनके पिता का नाम कुसुम्बर भूया था ।


शंकरदेव का पालन पोषण उनकी दादी खेरसुती ने किया था । ये बचपन से ही प्रतिभाशाली थे । इन्होंने अल्पायु में ही बिना मात्रा की एक भावपूर्ण कविता लिख डाली । यह कजिता इनके । जीवन की प्रथम कविता है । इन्होंने 22 वर्ष की आयु में समस्त वेद , पुराण , उपनिषद एवं व्याकरण का ज्ञान प्राप्त कर लिया । इनका विवाह सूर्यवती से हुआ । विद्याध्ययन के बाद इन्हें अपनी रियासत का कार्यभार देखना पड़ता था । अतः शास्तचर्चा में व्यवधान होने लगा ।


इसी कारण वह  समस्त कार्यभार अपने चाचा को सौंपकर भगवतचर्चा में सेला रहने लगे । शंकरदेव के एक पत्री का जन्म हुआ । दुर्भाग्यवश उस समय ही इनकी पत्नी का निधन हो गया । उस कारण उनको मानसिक आघात लगा । इसके बाद इनके हृदय में वैराग्य की भावना उत्पन्न हो गयी और वे देशाटन के लिए निकल पड़े । । शंकरदेव विभिन्न तीर्थों में भ्रमण करते रहे । तीर्थाल के समय इनको । विद्वानों , साधु एवं संतों से हुई । विद्वानों के सम्पर्क में रहने के कारण इनके ज्ञानकोश में वृद्धि हुई । इसके बाद इन्होंने वैष्णव धर्म का प्रचार करना प्रारम्भ किया ।


असम प्रदेश के लोग प्राचीन काल से ही अन्धविश्वास व आडम्बरों से ग्रस्त थे । उस समय लोग तन्त्र – मन्त्र व तांत्रिकों तथा सामाजिक रूदियों में जकडे हए थे । श्री शंकरदेव ने एकेश्वरवाद पर बल दिया । वे मूर्ति पूजा के भी भोर विरोधी थे । श्री . शंकरदेव को अपने धर्म के प्रति विशेष अभिरुचि थी । फलतः उन्होंने अनेक धार्मिक ग्रन्थों की रचना की । उनमें ‘ कीर्तन घोषा ‘ प्रमख है । इसके अतिरिका ।

अंकिया नाट का भी निर्माण किया । इन्होंने स्थान – स्थान पर धर्म का प्रचार करने के । लिए नामघर का निर्माण किया ।


श्री शंकरदेव ने असम के लोगों में अहिंसात्मक क्रान्ति लाने का प्रयास किया । उन्होंने लोगों के हृदय से अज्ञान का अन्धकार दूर कर जन जागृति उत्पन्न की । शंकरदेव की धारणा थी कि धर्म तोड़ता नहीं जोड़ता है । धर्म हमारी मन , बुद्धि एवं आत्मा के परिष्कार का प्रबल साधन है । ईश्वर एवं धर्म के प्रति आस्था ही मापन कल्याण की प्रमुख स्रोत है । उन्होंने भाओना अर्थात् पौराणिक नाटकों के अभिनय तथा नृत्य-संगीत के द्वारा धर्म प्रचार किया और अनेक पुस्तकों की रचना कीं । सन् 1568 ई. में भीषण ज्वर के कारण उनका देहान्त हो गया ।

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