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देश की पहली महिला ब्यूरोक्रैट ,जिन्हें हम कत्थक क्वीन के रूप में भी जानते हैं .जी हाँ आज आप मिलेंगे 'हमारी विभूतियाँ 'स्तम्भ में श्रीमती शोभना नारायण जी

देश की पहली महिला ब्यूरोक्रैट ,जिन्हें हम कत्थक क्वीन के रूप में भी जानते हैं .जी हाँ आज आप मिलेंगे 'हमारी विभूतियाँ 'स्तम्भ में श्रीमती शोभना नारायण जी से .


बिहार की बेटी जो दुनियाभर में मशहूर हुई कत्थक क्वीन के नाम से, पूर्व आईएएस अफसर, संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पद्मश्री शोभना नारायण 2 September 1950 को हुआ था। वह देश की पहली महिला ब्यूरोक्रेट हैं और पूरे विश्व में नृत्य प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। वह गुरु, कोरियोग्राफर और लेखक भी हैं और अब तक 16 किताबें लिख चुकी हैं। विश्वविख्यात नर्तक पंडित बिरजू महाराज की वह शिष्या हैं। 


वो जिद्दी थी, पर कथक की दीवानी थी। वो तब मासूम थी लेकिन उसे कथक से लगाव हो गया था। तब उनकी उम्र मात्र ढाई साल की थी जब उन्हें कथक के गुरू साधना बोस के पास कथक नृत्य सिखने के लिए ले जाया गया था। लेकिन तब उन्हें ये मालूम नहीं था की उनकी यही जिद एक दिन उन्हें दुनियाभर में मशहूर कर देगी।

आज वो पद्मश्री शोभना नारायण है और दुनिया उन्हें उनके नाम से जानती है। कथक क्वीन शोभना नारायण का जन्म पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हुआ। लेकिन मूलरूप से वो बिहार के मुजफ्फरपुर की रहने वाली है।


शोभनाजी के घर में मां और पिताजी के अलावा उनकी एक छोटी बहन रंजना नारायण थी। पिताजी सिविल सेवा में कार्यरत थे, तो मां सोशल वर्कर थी जबकि उनकी छोटी बहन रंजना नारायण आज सुप्रीम कोर्ट में लॉयर है। शोभनाजी जब मात्र ढाई साल की थी तब उनके पिताजी ने अपनी लाडली को कथक के गुरू साधना बोस के पास नृत्य की विद्या सिखाने के लिए ले गए। उस समय उनके पिताजी कोलकाता में ही कार्यरत थे।

कोलकाता में शोभनाजी ने एक साल तक अपने गुरू साधना बोस से कथक की बारीकियां सिखीं। लेकिन इसी बीच उनके पिताजी का तबादला मुंबई हो गया, जहां वो गुरू कुंदनलालजी से पांच सालों तक कथक नृत्य में खुद को तराशने की कोशिश की। लेकिन एक बार फिर उनके पिताजी का तबादला हुआ और वो 1962 मुंबई से दिल्ली आ गईं।


लेकिन कथक के प्रति उनकी दीवानगी कम नहीं हुई और यहां उन्होंने अपने नए गुरू बिरजू महाराजजी से कथक सिखने लगी और फिर दुनियाभर में मशहूर हो गई। शोभनाजी बीते दिनों को याद कर बताती है कि कैसे शुरूआती दिनों में बिरजू महाराज से कथक सिखने के दौरान किसी भी स्टेज शो में वो अपने गुरूजी से पहले अपना परफॉर्मेंस देती थी। 1972 में पहली बार कथक नृत्य के सिलसिले में शोभनाजी जर्मनी गई जहां उन्होंने 10वें बर्लिन यूथ फेस्टिबल में अपने कथक नृत्य से समा बांध दिया।

इसके बाद 1973 में पैरिस इंटरनैशनल म्यूजिक एंड डांस फेस्टिबल में शिरकत की और अपने मनमोहक नृत्य से दर्शकों को मोह लिया। जर्मनी और फ्रांस के बाद से कथक नृत्य के सिलसिले में शोभनाजी का विदेशी धरती पर जाने का जो कारवां शुरू हुआ वो आज भी जारी है। और अबतक शोभनाजी करीब 55 से ज्यादा देशों में कथक की प्रस्तुतियाँ कर चुकी हैं।

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